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महाराजा पृथ्वीराज चौहान: ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में एक सिंहावलोकन

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ब्लॉग पोस्ट शीर्षक: "महाराजा पृथ्वीराज चौहान: वीरता, विरासत और ऐतिहासिक भ्रांतियाँ" _____________________________ पृथ्वीराज रासो से : "छंद: सुनहु चौहान रज भूप भुजंग, धरणिधर धरम प्रताप पराग। जस धरम रथ रण रस भूष, बन्यो चित चंद्र पृथ्वीराज।" "जस बंस बरणि न सकै कवि, कथिन कलम को कौन उपाय। जग जगमग जस सिंह समान, राखे राज पृथ्वीराज।" भारत के मध्यकालीन इतिहास में पृथ्वीराज चौहान एक ऐसे शूरवीर थे, जिन्होंने अपनी बहादुरी, न्यायप्रियता और स्वाभिमान के बल पर एक स्थायी छवि बनाई। वे चौहान वंश के अंतिम प्रमुख शासक थे और दिल्ली तथा अजमेर की राजगद्दी के स्वामी थे। उनकी गाथाएं लोककथाओं, कविताओं और ऐतिहासिक ग्रंथों में पीढ़ी दर पीढ़ी गूंजती रही हैं। प्रारंभिक जीवन और राज्यारोहण पृथ्वीराज चौहान का जन्म लगभग 1166 ईस्वी में हुआ था। वे सोमेश्वर चौहान के पुत्र थे और बहुत ही कम उम्र में गद्दी पर बैठे। बचपन से ही उन्हें राजनीति, युद्ध-कला और धर्मशास्त्र की शिक्षा दी गई थी। उन्होंने कई पड़ोसी राजाओं को परास्त कर अपने राज्य का विस्तार किया और दिल्ली व अजमेर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों ...